
सेंट लुईस की यूरोप में वापसी
क्यूबा में सुरक्षित आश्रय न दिए जाने पर और उसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवेश करने के लिए की गई अपील को ठुकराने के बाद, सेंट लुईस के यात्री ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम या नीदरलैंड में उतर गए। जहाज में सवार प्रत्येक यात्रियों का भाग्य कई कारकों पर निर्भर करता था, जिनमें भौगोलिक स्थिति और जर्मनी के खिलाफ युद्ध की स्थिति भी शामिल थी।
मुख्य तथ्य
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प्रत्येक देश में शरणार्थियों को अनिश्चितता और वित्तीय कठिनाई का सामना करना पड़ा। शुरुआती समय में उन्हें अस्थायी दर्जा दिया गया था और हमेशा शरणार्थी कैम्प में रखा जाता था।
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यात्रियों को पश्चिमी यूरोप में नाजी द्वारा कब्जे वाले अन्य यहूदियों के समान अनुभव से गुजरना पड़ा था। उनमें से कई सारे लोगों की हत्या जर्मनों ने हत्या केंद्रों और यातना कैम्प में करी थी। अन्य लोग छिप गए या कई वर्षों तक जबरन मजदूरी करते रहे। और वहां से भागने में कुछ लोग सफल भी रहे।
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महाद्वीप पर वापस लौटे 620 यात्रियों में से 532 उस समय फंस गए थे जब जर्मनी ने पश्चिमी यूरोप पर कब्जा कर लिया था। उसमें आधे से कुछ अधिक ही मतलब 278 लोग होलोकॉस्ट से बच गए। उनमें से 254 यात्रियों की मृत्यु हुई: इनमें से 84 लोग बेल्जियम में थे; 84 लोग हॉलैंड में शरण लिए हुए थे, और 86 लोग फ्रांस में प्रवेश दिए हुए थे।
6 जून 1939 को सेंट लुईस जहाज वापस यूरोप की ओर जाने के लिए मुड़ गया था। उसके सात दिन बाद, जब जहाज अटलांटिक महासागर को पार कर रहा था, एक समझौता हुआ जिससे यात्रियों को नई उम्मीद मिली। जॉइंट डिस्ट्रीब्यूशन कमेटी (JDC) के यूरोपीय निदेशक मॉरिस ट्रॉपर ने अन्य यूरोपीय यहूदी संगठनों और सरकारी प्रतिनिधियों के साथ मिलकर, सेंट लुईस जहाज के यात्रियों के लिए ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड देशों में प्रवेश दिलाने की व्यवस्था की थी। ग्रेट ब्रिटेन ने 287 यात्रियों को, फ्रांस ने 224 यात्रियों को, बेल्जियम ने 214 यात्रियों को और नीदरलैंड ने 181 यात्रियों को अपने यहां शरण दिया गया।
सेंट लुईस जहाज एक महीने से अधिक समय तक समुद्र में रहने के बाद आखिरकार 17 जून को बेल्जियम के एंटवर्प में पहुंचा। उसके तीन महीने से भी कम समय बाद द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया। एक साल के अंदर ही, जर्मन ने पूरा पश्चिमी यूरोप कब्जे में ले लिया, और महाद्वीप पर मौजूद सेंट लुइस जहाज के पूर्व यात्रियों को फिर से नाजी आतंक का खतरा दिखने लगा।
जहाज से उतरने से पहले यात्रियों ने प्रश्नावली पूरी की थी, जिसका उपयोग शायद ही सरकारी प्रतिनिधियों और राहत एजेंसियों ने उनके गंतव्य स्थान का निर्णय करने के लिए किया होगा। उन यात्रियों से ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड में रहने वाले उनके मित्रों और रिश्तेदारों के नाम पूछे गए थे और साथ ही अमेरिकी वीज़ा के लिए उनके आवेदनों की और कोटा प्रतीक्षा सूची में उनके प्रतीक्षा संख्या के बारे में भी जानकारी मांगी गई थी, जिससे यह पता चला था कि वे संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवास करना चाहते हैं। उन सभी शरणार्थियों को केवल अस्थायी रूप से शरण दी गई थी; उन्हें आखिर में कहीं और स्थायी रूप से निवास करने के लिए प्रवास करने पर सहमत होना पड़ा। सबका अनुमान यह था कि जैसे ही उन सबका अमेरिकी कोटा प्रतीक्षा सूची का नंबर आएगा या जैसे ही उन्हें कोई अन्य स्थान मिलेगा, वे वहां से चले जाएंगे। सरकारी अधिकारी, जो पहले से ही राइक से आनेवाले यहूदी शरणार्थियों की बढ़ती संख्या से चिंतित थे, उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि सेंट लुइस जहाज के यात्रियों के साथ किया गया व्यवहार एक अपवादात्मक निर्णय का केस है, और जर्मनी से भाग रहे अन्य लोगों के लिए यह कोई मिसाल नहीं है।
बेल्जियम में शरण मिलने वाले यात्री पहले उतर गए और एक विशेष ट्रेन से ब्रुसेल्स पहुंचे, जहां उन्होंने रात बिताई। जिन यात्रियों के शहर में कोई रिश्तेदार नहीं थे, उन्हें लीज प्रांत के शरणार्थी केंद्र में ले जाया गया।
नीदरलैंड में शरण मिलने वाले यात्री अगले दिन "जान वैन आर्केल" जहाज पर सवार होकर रवाना हुए। उन यात्रियों का रॉटरडैम में आगमन होने पर डच अधिकारी उन सभी को एक अस्थायी शरणार्थी केंद्र में ले गए, जहां वे तब तक रहे जब तक उन्हें आवास नहीं मिला या उन्हें अन्य शरणार्थी कैम्प में नहीं भेज दिया गया।
फ्रांस और ग्रेट ब्रिटेन में शरण मिलने वाले यात्री एक मालवाहक जहाज पर सवार हुए, उस जहाज को इन यात्रियों को रखने के लिए फिर से तैयार किया गया था। वह जहाज 20 जून को बोलोग्ने सुर मेर पहुंचा, जहां फ्रांस जाने वाले यात्री उतर गए। उसके अगले दिन वे यात्री ले मैन्स, लावल और अन्य फ्रांसीसी शहरों में गए। JDC ने लगभग 60 बच्चों की देखभाल के लिए यहूदी बाल सहायता सोसायटी (ओयूव्रे डी सेकोर्स ऑक्स एनफैंट्स; OSE) की व्यवस्था की। उन्हें पेरिस के उत्तर में स्थित मोंटमोरेन्सी के कई घरों में रखा गया।
21 जून को, ग्रेट ब्रिटेन में शरण मिलने वाले यात्रियों का साउथेम्प्टन में आगमन होने के बाद उन्हें विशेष ट्रेन से लंदन ले जाया गया। लंदन में जर्मन-यहूदी सहायता कमेटी ने उन यात्रियों के लिए आवास की व्यवस्था की जो परिवार या मित्रों के साथ नहीं रह रहे थे। अधिकांश लोग निजी घरों या होटलों में चले गए, लेकिन लगभग 50 अकेले पुरुषों को केंट में स्थित एक पूर्व ब्रिटिश सेना के कैम्प में ले जाया गया, जिसे ब्रिटिश सरकार ने शरणार्थियों के उपयोग के लिए आवंटित किया था।
सभी शरणार्थी यात्रियों को अनिश्चितता और वित्तीय कठिनाई का सामना करना पड़ा। जब उन यात्रियों ने जर्मनी छोड़ने का निर्णय लिया था, नाज़ियों ने उन्हें उनकी संपत्ति छोड़ने के लिए मजबूर किया था। उनके काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके परिणामस्वरूप, सभी यात्री पूरी तरह से अपने रिश्तेदारों और यहूदी राहत एजेंसियों पर निर्भर हो गए थे। वे सभी सार्वजनिक बोझ न बन जाए इसलिए, JDC ने शरणार्थियों की सहायता के लिए 500,000 डॉलर उन्हें आवंटित करने पर सहमति व्यक्त की थी- जो कि JDC के फंड का एक बड़ा हिस्सा था।
अधिकांश पूर्व यात्रियों को स्थायी घर मिलने की आशा थी, मुख्यतः संयुक्त राज्य अमेरिका में। अमेरिकी वीज़ा के लिए प्रतीक्षा सूची में प्रतीक्षा कर रहे 600 या उससे अधिक लोग धीरज रखकर अपना नंबर आने का इंतजार कर रहे थे। अन्य यात्रियों ने विदेशी वाणिज्य दूतावासों से प्रवेश परमिट प्राप्त करने का प्रयास किया, लेकिन गरीब आप्रवासियों को स्वीकार करने के लिए बहुत कम देश तैयार थे। इस मामले को और बदतर ब्रिटिश सरकार के 1939 के व्हाइट पेपर ने बना दिया, जिसमें फिलिस्तीन में इमिग्रेशन को प्रतिबंधित कर दिया था।