Adolf Hitler salutes a crowd lining the streets of Hamburg

Volksgemeinschaft (जनता या राष्ट्रीय समुदाय)

1920 दशक के शुरुआत में, एडॉल्फ हिटलर और नाज़ी पार्टी ने एक Volksgemeinschaft (जनता या राष्ट्रीय समुदाय) बनाने की अपनी इच्छा पर जोर दिया, जो नस्ल, जातीयता और सामाजिक व्यवहार की नींव पर आधारित थी। सत्ता में आने के बाद, नाज़ियों ने अपने वैचारिक लक्ष्यों के अनुसार Volksgemeinschaft (जनता या राष्ट्रीय समुदाय) को आकार देने का लक्ष्य रखा।

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मुख्य तथ्य

  • 1

    नाज़ी पार्टी ने जर्मन लोगों को अपने नेतृत्व के तहत एकजुट करने का प्रयास किया। इन्होंने उन समूहों और व्यक्तियों को बाहर कर दिया जिन्हें नाज़ी नस्ली, जैविक, राजनीतिक या सामाजिक रूप से "अवांछनीय" माना जाता था।

  • 2

    नाज़ी सरकार ने उन जर्मनों को लाभ दिए जो "राष्ट्रीय समुदाय" का हिस्सा बने। इन्होंने उन लोगों पर अत्याचार किया जिन्हें "राष्ट्रीय समुदाय" से बाहर किया गया था।

  • 3

    परिणामस्वरूप, नाज़ियों के "राष्ट्रीय समुदाय" बनाने के प्रयासों ने उन सभी व्यक्तियों और समूहों पर अत्याचार और सामूहिक हत्या करने को बढ़ावा दिया जिन्हें इस समुदाय का हिस्सा नहीं माना गया।

1933 में, नाज़ियों के पास यूरोप के यहूदियों की हत्या करने की कोई ठोस योजना/ब्लूप्रिंट नहीं थी। जो बाद में होलोकॉस्ट के नाम से जाना गया, उसे समय के साथ कई कारकों और निर्णयों को मिलाकर करने की जरूरत थी। इन कारकों में कट्टर विचारधारा, यहूदियों के नफरत फैलाना और नस्लवाद शामिल थे। यह लेख नाज़ी विचारधारा में "राष्ट्रीय समुदाय" की अवधारणा पर प्रकाश डालता है।

परिचय

Volksgemeinschaft शब्द का अर्थ है "राष्ट्रीय समुदाय" या "जनता का समुदाय।" इस शब्द की उत्पत्ति जर्मनी में अठारहवीं सदी के अंत या उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में हुई थी। इस अवधारणा की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं थी। इसका उपयोग कई अलग-अलग तरीकों से किया गया था। इस शब्द को अपनाने वालों में राजतंत्रवादी, रूढ़िवादी, उदारवादी, समाजवादी और खुले तौर पर नस्लवादी संगठन शामिल थे। प्रत्येक राजनीतिक दल और उसके समर्थकों ने इस शब्द को अलग-अलग अर्थ और उद्देश्य दिए। 

1920 दशक के शुरुआत में, एडॉल्फ हिटलर और नाज़ी पार्टी ने एक Volksgemeinschaft बनाने की अपनी इच्छा पर जोर दिया, जो नस्ल, जातीयता और सामाजिक व्यवहार की नींव पर आधारित थी। सत्ता में आने के बाद, नाज़ियों ने अपनी विचारधारा के उद्देश्यों के अनुसार एक Volksgemeinschaft (राष्ट्रीय समुदाय) बनाने का लक्ष्य रखा। उन्होंने अपने नेतृत्व के तहत जर्मन जनता को एकजुट करने का प्रयास किया। उन्होंने उन समूहों और व्यक्तियों को बाहर कर दिया जिन्हें वे नस्ली, जैविक, राजनीतिक या सामाजिक रूप से "अवांछनीय" मानते थे। जिन्हें इस समुदाय से बाहर रखा गया, उनमें यहूदी, अश्वेत लोग (काले रंग वाले लोग), और रोमा तथा सिंती (जिन्हें अपमानजनक रूप से "जिप्सी" कहा जाता था) शामिल थे। इसके अलावा, उन जातीय जर्मन को भी बाहर कर दिया जिनका राजनीतिक या सामाजिक व्यवहार नाज़ी शासन की मान्यताओं के अनुरूप नहीं थे। नाज़ी शासन ने उन जर्मन लोगों को लाभ दिए जो "राष्ट्रीय समुदाय" में शामिल हुए। उसने उन लोगों को सताया जिन्हें इस समुदाय के बाहर का माना गया।

नाज़ी प्रोपेगेंडा और "राष्ट्रीय समुदाय" का मिथक

राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन वर्कर्स पार्टी (NSDAP या नाज़ी पार्टी) प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के बाद उभरने वाली कई कट्टर दक्षिणपंथी राजनीतिक पार्टियों में से एक थी। शुरू से ही यह एक यहूदी-विरोधी और नस्लवादी संगठन था। यह संगठन 1918 की नवंबर क्रांति के बाद स्थापित नए जर्मन गणराज्य का भी विरोध करता था। नाज़ी पार्टी ने 1920 के अपने पार्टी कार्यक्रम में, यह दावा किया कि केवल एक Volksgenosse (राष्ट्रीय साथी या जनता का सदस्य) ही नागरिक हो सकता है। "राष्ट्रीय साथी" को उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया था जो "जर्मन रक्त" का हो, चाहे उसका धार्मिक संप्रदाय कोई भी हो। इसी परिभाषा के हिसाब से, कोई भी यहूदी तो "राष्ट्रीय साथी" हो सकता था और ही नागरिक। नाज़ियों ने यहूदी लोगों को एक "विदेशी" नस्लीय समूह के रूप में परिभाषित किया, जिसकी उत्पत्ति मध्य पूर्व में हुई थी। इस प्रकार, नाज़ी विचारधारा के अनुसार, एक यहूदी कभी भी जर्मन नहीं बन सकता था। यह स्थिति तब भी लागू होती थी, चाहे वे जर्मन भाषा बोलते हों, ईसाई धर्म अपना चुके हों, या उनका परिवार सैकड़ों वर्षों से जर्मनी में रह रहा हो। 

1920 और 1930 के शुरुआती दशक में "राष्ट्रीय समुदाय" की अवधारणा

1920 और 1930 के शुरुआती दशक में, नाज़ी पार्टी ने लाखों जर्मन लोगों के वोट और समर्थन हासिल करने के लिए अभियान चलाया। प्रोपगेंडा करने वाले लोगों ने "राष्ट्रीय समुदाय" और "राष्ट्रीय साथी" जैसे शब्दों का चतुराई से उपयोग किया। वाइमर गणराज्य (1918-1933) के अंतिम वर्षों में, नाज़ी पार्टी ने जर्मन संसद (Reichstag) में अपनी प्रतिनिधित्व क्षमता को नाटकीय रूप से बढ़ा लिया। 1932 के गर्मियों के मौसम में, नाज़ी पार्टी जर्मन संसद (रैहस्टाग) में सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई। 

नाज़ी प्रोपगेंडा करने वाले लोगों ने पार्टी को एक ऐसे आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया जो राष्ट्रीय महानता और समृद्धि को पुनः स्थापित करने का लक्ष्य रखता थाएक ऐसा आंदोलन जो सैद्धांतिक रूप से सभी जर्मनों का प्रतिनिधित्व करता था, चाहे उनका वर्ग, क्षेत्र, या धर्म (ईसाई धर्म) कोई भी हो। हिटलर अक्सर इस बात पर जोर देता था कि नाज़ी पार्टी उस "राष्ट्रीय समुदाय" का एक लघुरूप है, जिसकी वह भविष्य के लिए कल्पना करता था। हिटलर ने कहा कि नाज़ी पार्टी, अपने विस्तृत जनसमर्थन के कारण, भविष्य के जर्मन "राष्ट्रीय समुदाय" की अग्रदूत के रूप में कार्य करती है। यह समुदाय आगे चलकर बदले में, नाज़ी राज्य की नींव के रूप में कार्य करेगा।

नाज़ी प्रोपगेंडा करने वाले लोगों ने नाज़ीवाद को एक ऐसा आंदोलन घोषित किया जो सभी जर्मन जातीय लोगों के लिए खुला था। यह विचार उन कई जर्मनों को प्रभावित करने में सफल रहा जो वर्तमान स्थिति से निराश हो चुके थे और ग्रेट डिप्रेशन (महामंदी) के दौरान देश की बढ़ती आर्थिक समस्याओं को हल करने में देश के नेतृत्व के असफल होने से हताश थे। हिटलर ने वादा किया कि वह व्हाइट कॉलर और ब्लू कॉलर कामगारों को साथ लाकर समाज में एकता लाएंगे और वर्गों के बीच नफरत और टकराव को खत्म करेंगे। इन अपीलों ने और जर्मनी को फिर से महान बनाने के विचारों ने कई लोगों का दिल जीत लिया।

15 जुलाई 1932 को, हिटलर ने एक चुनावी भाषण में इस बात को व्यक्त किया:

तेरह साल पहले, हम नेशनल सोशलिस्ट्स का मज़ाक उड़ाया जाता था और हमें तिरस्कृत किया जाता थाआज हमारे विरोधियों की हंसी आंसुओं में बदल गई है!

हमारे साथ एक निष्ठावान समुदाय खड़ा हो गया है, जो धीरे-धीरे वर्ग के पागलपन और पद का घमंड जैसी धारणाओं को दूर करेगा।एक निष्ठावान समुदाय तैयार हो गया है, जो हमारी जाति की रक्षा के लिए संघर्ष करने को प्रतिबद्ध है, यह संघर्ष इसलिए नहीं है कि वे बवेरिया, प्रशिया, वुर्टेमबर्ग या सैक्सनी से हैं, और ही इसलिए कि वे कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, मजदूर, सिविल सेवक, व्यापारी या वेतनभोगी कर्मचारी हैं, बल्कि इसलिए कि वे सभी जर्मन हैं।

हालांकि, अपने चुनाव अभियानों के दौरान नाज़ी पार्टी ने कभी यह नहीं बताया कि नया "राष्ट्रीय समुदाय" कैसे बनाया जाएगा और इसमें पूरी तरह से कौन शामिल होगा, साथ ही यह किस कीमत पर होगा।

तीसरा राइख: "राष्ट्रीय समुदाय" के निर्माण की नींव के रूप में उत्पीड़न

सत्ता में आने के बाद, नाज़ी शासन (जो स्वयं को तीसरा राइख कहता था) ने सभी जातीय और राजनीतिक रूप से विश्वसनीय जर्मनों के लिए एक "राष्ट्रीय समुदाय" बनाने के अपने वादे को पूरा करने का प्रयास किया। विद्वानों के बीच इस बात पर बहस है हो रही थी कि नाज़ी शासन इस लक्ष्य को वास्तविकता में बदलने में कितना सफल हुआ या हुआ भी नहीं। हालांकि, इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह तीसरे राइख के दौरान नाज़ी प्रोपगेंडा का एक अभिन्न हिस्सा था। इसका उपयोग एक विभाजित राष्ट्र को एकजुट करने के लिए किया गया था, जिसमें समुदाय का हिस्सा होने पर गर्व का भाव पैदा किया गया, जबकि साथ ही उन लोगों के प्रति संदेह, डर और/या नफरत को बढ़ावा दिया गया जो इसके बाहर के समुदाय के थे।

नाज़ी जर्मनी में यहूदियों, अश्वेत लोगों और रोमा और सिंटी जैसे समूहों को "नस्ली रूप से बाहरी" घोषित किया गया। इसलिए, वे "राष्ट्रीय समुदाय" का हिस्सा नहीं बन सकते थे। उन्हें उनके अधिकारों से वंचित किया गया और उनका उत्पीड़न किया गया। यहूदी और रोमा तथा सिंटी समुदाय का बाद में पूरी तरह से विनाश करने का निर्णय लिया गया। 

नाज़ी शासन ने उन लोगों को भी उत्पीड़ित किया जिनका राजनीतिक या सामाजिक आचरण /व्यवहार नए "राष्ट्रीय समुदाय" के अनुरूप नहीं था। नाज़ी शासन ने राजनीतिक विरोधियों, समलैंगिक पुरुषों, यहोवा के साक्षियों, "जाति अपवित्रकों" और अन्य लोगों को इन आधारों पर निशाना बनाया। यदि कोई व्यक्ति जर्मन जातीय वंश का था और उसने अपने आचरण /व्यवहार बदलाव किया, तो उसे "राष्ट्रीय समुदाय" में शामिल किया जा सकता था। 

नाज़ी नीतियों और कानूनों ने "असमानता" को कानूनी रूप दिया और विभिन्न पीड़ित समूहों को "राष्ट्रीय समुदाय" की सदस्यता से बाहर करने को उचित ठहराया। 15 सितंबर 1935 का राइख नागरिकता कानून, जो नूर्नबर्ग नस्लीय कानूनों में से एक था, उसमें यह स्पष्ट किया गया कि नए जर्मनी में कौन नागरिक हो सकता है और कौन नहीं। इस कानून के तहत, केवल वही व्यक्ति नागरिक हो सकता था जो "जर्मन या संबंधित रक्त" का हो और अपने व्यवहार से यह साबित करे कि वह जर्मन लोगों और राइख की निष्ठापूर्वक सेवा करने की इच्छा और क्षमता रखता हो। इस प्रावधान ने स्पष्ट कर दिया कि नागरिकता कोई अधिकार नहीं था, बल्कि एक विशेषाधिकार था जिसे नाज़ी नेतृत्व द्वारा तय किया जाता था। बाद में जारी किए गए आदेशों में यह स्पष्ट किया गया कि यहूदी, अश्वेत लोग और रोमा सिंती समुदाय जर्मन नागरिकता रखने के योग्य नहीं होंगे। 

"राष्ट्रीय समुदाय" की बदलती अवधारणाएं 

Slide shown during lectures at the State Academy for Race and Health in Dresden

एक श्वेत जर्मन महिला और एक अश्वेत फ्रांसीसी सैनिक की पुत्री श्वेत सहपाठियों के बीच खड़ी है। म्यूनिख, 1936.  इस छवि को जर्मनी के ड्रेसडेन में स्टेट एकेडमी फॉर रेस एंड हेल्थ में अनुवांशिकी, मानव जाति विज्ञान और नस्ल प्रजनन पर लेक्चर के लिए एक स्लाइड के तौर पर शामिल किया गया था।

क्रेडिट:
  • Library of Congress

नाज़ी शासन के तहत, "राष्ट्रीय समुदाय" और "राष्ट्रीय साथी" जैसे शब्दों के अर्थ समय और परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते थे। नाज़ी लीडरशिप इन शब्दों को अपनी सुविधा के अनुसार बदलकर विभिन्न लोगों को बाहर करने के लिए उपयोग कर सकता था। जर्मन नागरिक जो यहूदी दुकानों से खरीदारी करते रहे या यहूदी पड़ोसियों से दोस्ती बनाए रखते थे, उन्हें "जनता के गद्दार" कहा गया। विदेश में रहने वाले जर्मन नागरिक, जिन्होंने शासन का विरोध किया, अक्सर उनकी नागरिकता छीन ली गई। इसी प्रकार, नाज़ी अधिकारियों ने उन लोगों के खिलाफ सार्वजनिक अभियान शुरू किए जिन्हें Gemeinschaftsfremde (समुदाय के एलियन) माना गया। 

दिसंबर 1937 में, नाज़ी शासन ने अपराध रोकथाम से संबंधित एक आदेश जारी किया। यह आदेश उन व्यक्तियों के खिलाफ था जिन्हें "असामाजिक" करार दिया गया था। इन व्यक्तियों को ऐसे लोगों के रूप में परिभाषित किया गया, जो अपने सामुदायिक विरोधी व्यवहार (चाहे वह आपराधिक हो) के कारण यह दर्शाते थे कि वे समुदाय का हिस्सा बनना नहीं चाहते। इस तरह की व्यापक परिभाषा ने पुलिस को लगभग 1,00,000 व्यक्तियों को गिरफ्तार करने और कैद करने की अनुमति दी। गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों में वे लोग शामिल थे जिन्हें "कामचोर," आवारा, वेश्याएं और भिखारी माना गया, साथ ही रोमानी और सिंती समुदाय के लोग भी। 

1938 के बाद और युद्ध के वर्षों के दौरान, नाज़ी शासकों ने ऐसी नीतियों को जातीय जर्मन लोगों पर भी लागू किया। नाज़ी शासन सभी जर्मन वंशजों को जातीय जर्मन (Volksdeutsche) नहीं मानता था, बल्कि केवल उन लोगों को मानता था, जो नए जर्मनी की नीतियों का समर्थन करते थे। जर्मन वंशज वाले व्यक्तियों को, जो स्वयं को पोलिश या सोवियत नागरिक मानते रहे या जिन्होंने "गैर-जर्मन" व्यवहार किया, उन्हें "राष्ट्रीय समुदाय" का हिस्सा बनने की अनुमति नहीं दी गई। द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) के दौरान, जर्मन मूल के सैकड़ों हजारों लोगों को SS द्वारा सोवियत संघ और अन्य कब्जे वाले क्षेत्रों से जर्मन-अधिकृत पोलैंड में स्थानांतरित किया गया। SS ने नए आने वाले लोगों की नस्लीय और राजनीतिक जांच की।

युद्ध के दौरान लाखों गैर-जर्मन लोगों को जबरन मजदूर के रूप में राइख में लाया गया। लाखों जर्मन पुरुषों को सैन्य सेवा के लिए भर्ती किए जाने के कारण, नाज़ी अधिकारियों को डर था कि गैर-जर्मन लोग, विशेष रूप से स्लाव जातियों की बड़ी संख्या में उपस्थिति जर्मन जनसंख्या की नस्लीय और जातीय संरचना पर नकारात्मक प्रभाव डालेगी। जर्मन महिलाओं, जिन्होंने पोलिश, सोवियत और अन्य विदेशी नागरिक मजदूरों या युद्धबंदियों के साथ यौन संबंध बनाए थे या जिन पर ऐसा करने का आरोप था, उन सभी महिलाओं को अक्सर सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता था और उन्हें "राष्ट्रीय समुदाय" से बाहर कर दिया जाता था। कई बार उन्हें यातना कैंप (शिविरों) में भेज दिया जाता था। मजबूर मजदूरों को अक्सर यातना कैंप (शिविरों) में कैद किया जाता था या उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता था।

जर्मन लोगों को Volksgemeinschaft के पक्ष में लाना

हालांकि नाज़ी कभी वास्तविकता में Volksgemeinschaft बनाने में सफल नहीं हुए थे, लेकिन उन्होंने प्रोपगेंडा में इसे अवश्य निर्मित किया। नाज़ी प्रोपगेंडा करने वाले लोगों को इस बात के निर्देश दिए गए थे कि कार्यक्रमों को इस प्रकार आयोजित किया जाए जिससे प्रतिभागियों को यह महसूस हो कि वे एक "राष्ट्रीय समुदाय" का हिस्सा हैं। 

Adolf Hitler addresses an SA rally, Dortmund, Germany, 1933

एडॉल्फ हिटलर द्वारा एक इस आय रैली को संबोधन। डॉर्टमुंड, जर्मनी, 1933। 

क्रेडिट:
  • US Holocaust Memorial Museum, courtesy of William O. McWorkman

जर्मन फिल्म निर्माताओं और फोटोग्राफरों ने बड़ी संख्या में जर्मन लोगों को एडॉल्फ हिटलर के लिए जोरदार उत्साह दिखाते हुए चित्रित किया (फोटो निकाला) इस चित्रण (फोटो) ने "हिटलर मिथक" को विश्वसनीयता दी और एक काल्पनिक "राष्ट्रीय समुदाय" की रचना की। जर्मन लोगों को नया जर्मन अभिवादन "हाइल हिटलर" कहते हुए सलामी देने के लिए प्रेरित किया और उन पर दबाव डाला गया। इस प्रयास का उद्देश्य जर्मनों और विदेशियों को यह विश्वास दिलाना था कि पूरा राष्ट्र उनके शासन और उसकी नीतियों के साथ खड़ा है। जो व्यक्ति इसमें भाग नहीं लेते थे उनपर विशेष ध्यान रखा जाता था। भाग नहीं लेना यह संकेत करता था कि वह व्यक्ति स्वयं को "राष्ट्रीय समुदाय" का हिस्सा नहीं मानता है। भले ही कुछ जर्मन लोग इस सरकार का पूरी तरह समर्थन करते हों, लेकिन अक्सर सार्वजनिक या पुलिस जांच से बचने के लिए वे सभी ऐसे अनुष्ठानों (धार्मिक संस्कार) में शामिल हो जाते थे। 

सिनेमा और समाचार फिल्मों में, नाज़ी प्रोपगेंडा फैलाने वाले लोगों ने जनता को यह दिखाने का प्रयास किया कि पूरा जर्मनी फ्यूहरर/ Führer के समर्थन में खड़ा है। लेनी रीफेनश्टाल की फिल्म Triumph of the Will / इच्छाशक्ति की जीत नाज़ी द्वारा "राष्ट्रीय समुदाय" के मंचन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उदाहरण के लिए, इस फिल्म में 1934 के नाज़ी पार्टी रैली के दौरान नूरेमबर्ग में जर्मन श्रम सेवा के सदस्यों द्वारा अपने घरों के क्षेत्रों के नाम पुकारने के चतुराई से बनाए गए दृश्य शामिल हैं। इसका उद्देश्य यह दिखाना था कि कैसे जर्मनचाहे वे किसी भी क्षेत्र, वर्ग या धर्म के होंएक नए जर्मनी के निर्माण के लिए सभी एकजुट हो रहे थे। 

नाज़ी प्रोपगेंडा फैलाने वाले लोगों ने पोस्टरों जैसी अन्य दृश्य सामग्री का भी इस्तेमाल किया। सुखी जर्मन परिवारों की तस्वीरों ने एक स्वस्थ भविष्य की आशाजनक तस्वीर पेश की। और मुस्कुराते हुए कारखानों के श्रमिकों को दर्शाने वाले पोस्टरों का उद्देश्य सामाजिक सद्भाव और वर्गों के बीच का टकराव खत्म हुआ यह व्यक्त करना था।

विशेषाधिकार और असमानता

नाज़ी शासन ने जनसंख्या को एक विशेषाधिकार देने का प्रस्ताव दिया अगर वे नाज़ी मानदंडों का पालन करेंगे। जर्मन श्रम मोर्चे की वजह से, जर्मन कर्मचारियों को जर्मनी के अंदर और बाहर कम खर्च पर छुट्टियां बिताने का मौका मिला। नॉर्वे और दूसरी जगहों की समुद्री यात्राओं को आकर्षक सुविधाओं के तौर पर दिखाया गया। हिटलर ने Volkswagen (लोगों की गाड़ी) नाम की एक सस्ती कार बनाने का भी वादा किया, जिससे जर्मन लोग उस किफायती गाडी को खरीद कर जर्मनी में बने नए हाईवे पर चला सकते थे। हालांकि, बहुत से जर्मनों ने नई कार खरीदने के लिए पैसे निवेश किए, किसी को भी वह कार नसीब नहीं हुई। 

"राष्ट्रीय समुदाय" का प्रोपगेंडा नाज़ी जर्मनी की खुली असमानताओं और अत्याचारों पर एक नक़ाब जैसा बन गया था। शासन ने श्रमिकों की आय/वेतन/मजदूरी को 1932 की आर्थिक मंदी के स्तर पर रोक दिया और काम के घंटे बढ़ा दिए। कारखानों में कामकाज के नियमों को और कठोर कर दिया गया और हड़तालों पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई। टैक्स बढ़ाया गया। विशेषकर बाहर से आने वाले सामान समेत, उपभोक्ता वस्तुओं की उपलब्धता पर पाबंदी लगा दी गई। जर्मनी के सभी नागरिकों को सरकार के विभिन्न राहत कार्यों में आर्थिक मदद करने के लिए कहा गया था। इन पैसों को समुदाय के फ़ायदे के लिए व्यक्तिगत कुर्बानी के तौर पर पेश किया गया। 

"राष्ट्रीय समुदाय" का प्रभाव

परिणामस्वरूप, नाज़ियों के "राष्ट्रीय समुदाय" बनाने के प्रयासों ने उन सभी व्यक्तियों और समूहों पर अत्याचार और सामूहिक हत्या करने को बढ़ावा दिया जिन्हें इस समुदाय का हिस्सा नहीं माना गया। नाजियों का उद्देश्य यूरोप के यहूदियों और अन्य लोगों के खिलाफ नफ़रत भड़काना था, जिन लोगों को उन्होंने "राज्य के दुश्मन" नाम से घोषित किया था। उन्होंने दूसरों के दुख-दर्द के प्रति उदासीनता का माहौल बनाने में भी सहायता की। कई जर्मनों को "राष्ट्रीय समुदाय" में शामिल होना लुभावना लगा और पीड़ितों की हालत को अनदेखा करना या उनपर ध्यान नहीं देना उन्हें सही लग रहा था।

फुटनोट

  1. Footnote reference1.

    मैक्स डोमरस, एड., कम्प्लीट हिटलर स्पीचेस इन इंग्लिश: डिजिटल डेस्कटॉप रेफरेंस, ट्रांस. मैरी फ्रैन गोल्बर्ट (वाकोंडा, IL: बोल्चाज़ी-कार्डुची पब्लिशर्स, 1990), 145.

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