
एक यहूदी-विरोधी षड़यंत्र: प्रोटोकॉल्स ऑफ द एल्डर्स ऑफ ज़ाइयों
द प्रोटोकॉल्स ऑफ द एल्डर्स ऑफ ज़ाइयों एक यहूदी-विरोधी पुस्तक है, जिसका उपयोग यहूदियों के प्रति नफरत फैलाने के लिए किया गया। यह पुस्तक पहली बार 1903 में प्रकाशित हुआ था। प्रोटोकॉल्स में यहूदी समुदाय की कथित वैश्विक सत्ता को लेकर षड्यंत्रकारी कथाएं प्रस्तुत की गई हैं। यह आधुनिक युग का सबसे व्यापक रूप से फैलाया गया यहूदी-विरोधी प्रकाशन है।
मुख्य तथ्य
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द प्रोटोकॉल्स ऑफ द एल्डर्स ऑफ ज़ाइयों एक ऐसा प्रकाशन है, जो कई भाषाओं और रूपों में प्रसारित किया जाता है। यह प्रिंट रूप में, इंटरनेट पर, और अन्य मीडिया में मौजूद है। इस पुस्तक के कई अलग-अलग संस्करण उपलब्ध हैं। हालांकि, सभी संस्करण यहूदियों के खिलाफ यहूदी-विरोधी षड्यंत्र कथाओं को बढ़ावा देते हैं।
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एडोल्फ हिटलर और नाज़ी पार्टी के अन्य शीर्ष नेताओं को पता था कि प्रोटोकॉल्स पुस्तक तथ्यात्मक नहीं था। इसके बावजूद, उन्होंने इस पुस्तक का उपयोग यहूदियों के प्रति नफरत फैलाने के लिए किया।
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प्रोटोकॉल्स का बार-बार एक झूठ के रूप में खुलासा किया गया है। फिर भी, यह पुस्तक एक शक्तिशाली यहूदी-विरोधी प्रोपेगेंडा साधन बना हुआ है।
द प्रोटोकॉल्स ऑफ द एल्डर्स ऑफ ज़ाइयों एक ऐसा प्रकाशन है, जो पहली बार 20वीं सदी की शुरुआत में सामने आया। तब से, यहूदी-विरोधी षड्यंत्र कथाकारकों ने इसका उपयोग इस झूठ को फैलाने के लिए किया है कि एक गुप्त यहूदी संगठन दुनिया को नियंत्रित करता है। पिछली कई दशकों में प्रोटोकॉल्स पुस्तक के अनेक संस्करण और वर्जन प्रकाशित किए गए हैं। यह आज भी प्रकाशित किया जा रहा है। हाल के वर्षों में, प्रोटोकॉल्स पुस्तक इंटरनेट और सोशल मीडिया सहित कई माध्यमों में व्यापक रूप से प्रसारित हुआ है।
प्रोटोकॉल्स पुस्तक पहली बार 1903 में रूसी साम्राज्य के एक अखबार में प्रकाशित हुआ था। प्रकाशक ने यह दावा किया कि उसने एक वास्तविक दस्तावेज़ खोजा है, जो यहूदियों की विश्वव्यापी षड्यंत्र को साबित करता है। लेकिन यह सच नहीं था। पत्रकारों, न्यायालयों, और सरकारों ने प्रोटोकॉल्स पुस्तक का नकली दस्तावेज़ के रूप में खुलासा किया है, जो यहूदी-विरोधी झूठ को बढ़ावा देता है।
यह जानते हुए भी कि यह एक जालसाजी है, यहूदियों के खिलाफ षड्यंत्र कहानियां फैलाने वाले लोग पिछले 120 वर्षों से प्रोटोकॉल्स पुस्तक का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। प्रोटोकॉल्स को अक्सर वर्तमान घटनाओं के अनुरूप ढाला जाता है। इसका प्रभाव—जैसे षड्यंत्रकारी सोच का प्रभाव—इसकी उस क्षमता पर निर्भर करता है, जो जटिल दुनिया के लिए सरल स्पष्टीकरण प्रस्तुत करता है।
द प्रोटोकॉल्स ऑफ द एल्डर्स ऑफ जायन क्या है?
प्रोटोकॉल्स पुस्तक एक गुप्त लिखित रिकॉर्ड होने का दावा किया जाता है, जिसमें "जायनके विद्वान बुजुर्ग" नामक समूह द्वारा कथित रूप से आयोजित बैठकों का विवरण दिया गया है। बैठकों के ये विवरण मिथ्या हैं। ये बैठकें कभी हुई ही नहीं, और कथित नेतृत्वकर्ता , जिन्हें "जायन के बुजुर्ग" कहा गया, वे कभी अस्तित्व में थे ही नहीं।
प्रारंभिक प्रकाशनों में 24 अध्याय या प्रोटोकॉल्स (बैठकों के विवरण) शामिल थे। प्रत्येक अध्याय में यह दावा किया गया है कि इसमें बुजुर्गों की उन गुप्त योजनाओं का विवरण दिया गया है, जिससे यहूदी समुदाय के लाभ के लिए विश्व राजनीति, अर्थव्यवस्था, वित्तीय बाजारों, मीडिया, शिक्षा और समाज के अन्य क्षेत्रों (हिस्सों) पर नियंत्रण स्थापित किया जाए। अन्य यहूदी-विरोधी झूठी कहानियों में यह दावा शामिल है कि यहूदी ईसाई धर्म और अन्य सभी विश्व धर्मों को नष्ट कर देंगे। प्रोटोकॉल्स यह भी कहता है कि यहूदी दुनिया को युद्ध की स्थिति में बनाए रखकर लाभ कमाएंगे।
प्रोटोकॉल्स के अलग-अलग संस्करण या रूपांतर मौजूद हैं, लेकिन इन सभी का उद्देश्य एक ही है: दुनिया की समस्याओं का कारण यहूदियों को ठहराना। दूसरों की गलतियों के लिए किसी और को दोषी ठहराना "बलि का बकरा बनाना" कहलाता है। प्रोटोकॉल्स को बढ़ावा देने वाले लोगों का उद्देश्य हमेशा यहूदियों को विभिन्न समस्याओं के लिए दोषी ठहराना होता था, ताकि उन्हें बदनाम किया जा सके।
दीर्घकालिक यहूदी-विरोधी कहानियां और प्रोटोकॉल्स
यहूदी-विरोधी षड्यंत्र की कहानियां कई सदियों से मौजूद हैं। ये कहानियां समय के साथ विकसित होती गईं, जिनमें धार्मिक, आर्थिक, राष्ट्रवादी और नस्लवादी विचारों का उपयोग करके यहूदियों के प्रति नफरत फैलाने का प्रयास किया गया। यहूदियों पर झूठा आरोप लगाया गया है कि उन्होंने यीशु की हत्या की (ईश्वर हत्या); युद्धों और क्रांतियों को भड़काने; यहां तक कि महामारियों और बीमारियों को फैलाने का भी झूठा आरोप लगाया गया है। उन पर राजनीति और विश्व अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने का भी झूठा आरोप लगाया गया है।
19वीं सदी में यहूदी विरोधी विचारधारा और अधिक व्यापक हो गया। इस समय के दौरान, यूरोपीय और उत्तर अमेरिकी समाजों में बड़े सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन हुए। तब समय संचार के क्षेत्र में भी प्रगति हुई थी, जिसमें नई छपाई तकनीकें शामिल थीं। इससे लोगों को अपने विचारों को तेजी से पूरे विश्व में फैलाने की सुविधा मिली। उस समय की यहूदी विरोधी विचारधारा में से एक यह थी कि यहूदियों ने अपने लाभ के लिए इन सभी बदलावों की योजना बनाई। ऐसी यहूदी-विरोधी षड्यंत्र की कहानियां प्रोटोकॉल्स के कई संस्करणों में लिखी गई हैं।
हालांकि प्रोटोकॉल्स ने यहूदियों के खिलाफ इन पूर्वाग्रहों को नहीं बनाया, लेकिन इसी ने इसे एक ही स्रोत में इकट्ठा कर दिया था। यह पुस्तक सबसे प्रचलित यहूदी-विरोधी षड्यंत्र की कहानियों को बढ़ावा देती है और उन्हें और फैलाती है।
प्रोटोकॉल्स की शुरुआत: इस झूठ की शुरुआत कहाँ से हुई?
द प्रोटोकॉल्स ऑफ द एल्डर्स ऑफ जायन का पहला संस्करण 1903 में आया था। उसी साल पतझड़ में, प्रोटोकॉल्स को रूस के सेंट पीटर्सबर्ग के अखबार "ज़नमिया" (द बैनर) में क्रमशः प्रकाशित किया गया। पावेल क्रुशेवन "ज़नमिया" अखबार का मालिक था। क्रुशेवन एक कुशल लेखक और एक निर्दयी यहूदी-विरोधी व्यक्ति था। वह रूसी साम्राज्य में कई अखबारों का मालिक था और उनका उपयोग यहूदियों के प्रति नफरत फैलाने के लिए करता था। अप्रैल 1903 में, क्रुशेवन के एक अखबार में प्रकाशित यहूदी-विरोधी लेखों ने किशिनेव में पोग्रोम (यहूदी-विरोधी हिंसा) को भड़काने में योगदान दिया।
कुछ विद्वानों को पूरा यकीन था कि प्रोटोकॉल्स के मूल लेखक क्रुशेवन ही है। जब उनके अखबार ने यह सामग्री प्रकाशित की, तब क्रुशेवन ने इसके लिए एक प्रस्तावना और उपसंहार लिखा था। उन्होंने दावा किया कि प्रोटोकॉल "वर्ल्ड यूनियन ऑफ फ्रीमेसन्स एंड एल्डर्स ऑफ जायन" की बैठक का विवरण है।( क्रुशेवन ने यहूदियों पर दुनिया पर कब्जा करने के षड्यंत्र का आरोप लगाया था। उन्होंने "सबूत" के तौर पर उभरते हुए ज़ायोनिस्ट आंदोलन का उल्लेख किया। उस समय के अन्य राष्ट्रवादी आंदोलनों की तरह, ज़ायोनवाद का उद्देश्य प्राचीन यहूदी मातृभूमि में एक स्वतंत्र यहूदी राष्ट्र की स्थापना करना था। कुछ लोगों ने दावा किया है कि प्रोटोकॉल्स 1897 में स्विट्जरलैंड के बासेल में आयोजित प्रथम ज़ायोनिस्ट कांग्रेस की बैठक विवरण हैं, लेकिन यह सच नहीं है।
1905 में, प्रोटोकॉल्स को ईसाई-विरोधी के आगमन के बारे में लिखी गई एक पुस्तक के परिशिष्ट के रूप में प्रकाशित किया गया था। इस पुस्तक को यहूदी-विरोधी रूसी रहस्यवादी सर्गेई नाइलस द्वारा लिखा गया था। इसमें लिखा गया है कि यहूदी शैतानी शक्तियों के एजेंट हैं, जो दुनिया को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रोटोकॉल्स की कहानियां धीरे-धीरे दुनिया भर में फैलने लगीं
1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद, द प्रोटोकॉल्स ऑफ द एल्डर्स ऑफ जायन की कहानियां और अधिक व्यापक रूप से फैलने लगीं। उसी वर्ष, एक जनविद्रोह के बीच रूसी ज़ार ने अपना सिंहासन छोड़ दिया। प्रदर्शनकारियों ने भोजन, प्रथम विश्व युद्ध का अंत, और ज़ार के साम्राज्यवादी शासन के अंत की मांग की। कुछ महीनों बाद, बोल्शेविक पार्टी ने एक तख्तापलट में रूस की सत्ता पर कब्जा कर लिया, जिसे बोल्शेविक क्रांति के नाम से जाना जाता है। बोल्शेविक पार्टी बाद में कम्युनिस्ट पार्टी के नाम से जानी जाने लगी।
यूरोप भर में इसी तरह की कम्युनिस्ट क्रांतियों के फैलने के डर ने प्रोटोकॉल्स में शामिल मुख्य यहूदी-विरोधी षड्यंत्र कहानियों में से एक और झूठी कहानी को बढ़ावा दिया : कि यहूदियों को कम्युनिज़्म के लिए और इस क्रांति की षड्यंत्र रचने के लिए दोषी ठहराया गया। इस झूठे आरोप को अक्सर "यहूदी-बोल्शेविज़्म" कहा जाता है।
अगले कुछ वर्षों में, प्रोटोकॉल्स ने कई अन्य देशों में अपने लिए सहानुभूतिपूर्ण समर्थन पाया। इसे कई भाषाओं में अनुवादित किया गया और दुनिया भर में प्रकाशित किया गया। 1919 में जर्मनी में प्रोटोकॉल्स का जर्मन भाषा में संस्करण प्रकाशित हुआ। 1920 के दशक में, प्रोटोकॉल्स के विभिन्न संस्करण पूरे यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रकाशित हुए। पेरिस में इसका फ्रेंच अनुवाद प्रकाशित हुआ, और लंदन, न्यूयॉर्क और बोस्टन में अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हुए। जल्द ही इसके संस्करण जापानी (1920), इतालवी (1921), स्वीडिश (1921), नॉर्वेजियन (1921), और पोलिश (1923) भाषाओं में भी प्रकाशित करके उपलब्ध कराए गए। 1925 तक सीरिया में इसका अरबी अनुवाद भी उपलब्ध हो गया था।
प्रोटोकॉल्स ने यहूदी-विरोधी षड्यंत्र कथाओं को बढ़ावा देने वाली कई अन्य पुस्तकों को प्रेरित किया। संयुक्त राज्य अमेरिका में सर्वाधिक प्रसिद्ध पुस्तकों में से एक हेनरी फोर्ड की पुस्तक द इंटरनेशनल ज्यू: द वर्ल्ड्स फोरमोस्ट प्रॉब्लम थी। फोर्ड, फोर्ड मोटर कंपनी के संस्थापक थे। 1920 के दशक तक, वह संयुक्त राज्य अमेरिका के सबसे प्रसिद्ध और सम्मानित व्यक्तियों में से एक थे। द इंटरनेशनल ज्यू सबसे पहले फोर्ड के अखबार द डियरबॉर्न इंडिपेंडेंट में क्रमिक रूप से प्रकाशित हुआ था।। यह जल्दी ही एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ और जर्मन सहित कम से कम 16 भाषाओं में अनुवादित किया गया। नाज़ी पार्टी के नेताओं, जिनमें एडोल्फ हिटलर भी शामिल थे, उन सबने "द इंटरनेशनल ज्यू" पुस्तक से प्रेरणा ली।
जैसे-जैसे प्रोटोकॉल्सदुनिया भर में फैला, उसके पाठ के कुछ विवरण को अक्सर वर्तमान घटनाओं और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार संशोधित किया जाता था। यही कारण है कि प्रोटोकॉल्स की सामग्री संस्करण दर संस्करण और भाषा दर भाषा भिन्न होती है। इसके बावजूद, सभी संस्करणों में यहूदी-विरोधी मुख्य विचार समान ही रहते हैं।
प्रोटोकॉल्स का झूठ के रूप में खुलासा किया गया: साल 1920 में
1920 में, ब्रिटिश पत्रकार और राजनयिक लूसियन वोल्फ ने एक पुस्तक प्रकाशित किया, जिसमें प्रोटोकॉल्स को एक झूठ के रूप में उजागर किया गया था। उन्होंने पाया कि जर्मन उपन्यास बियारिट्ज़ (1868) के एक अध्याय में उन विचारों का उपयोग किया गया था, जिन्हें प्रोटोकॉल्स की सामग्री बनाने के लिए गढ़ा गया था। इस कहानी में यह दिखाया गया है कि यहूदी नेता प्राग के पुराने यहूदी कब्रिस्तान में गुप्त बैठक करते हैं। और उस गुप्त बैठक के अंत में शैतान आता है और उनका समर्थन करता है।
उसके अगले वर्ष ही, लंदन के "द टाइम्स" अखबार ने प्रोटोकॉल्स को "फर्जी" और "भद्दा जालसाजी" घोषित किया। द टाइम्स ने पाया कि प्रोटोकॉल्स का अधिकांश भाग एक कम प्रसिद्ध फ्रेंच राजनीतिक व्यंग्य से कॉपी किया गया था, जिसका नाम है: मॉरिस जोली की पुस्तक डायलॉग इन हेल बिटवीन मैकियावेली एंड मॉन्टेस्क्यू (1864)। डायलॉग इन हेल में यहूदियों का कोई उल्लेख नहीं है।
जल्द ही, संयुक्त राज्य अमेरिका और जर्मनी में प्रोटोकॉल्स का पर्दाफाश करने वाली अन्य रिपोर्टें भी प्रकाशित हुईं। न्यूयॉर्क हेराल्ड के रिपोर्टर हरमन बर्नस्टीन ने 1921 में "द हिस्ट्री ऑफ ए लाई: द प्रोटोकॉल्स ऑफ द वाइज़ मेन ऑफ जायन” नामक पुस्तक प्रकाशित की। तीन साल बाद, जर्मन पत्रकार बेंजामिन सेगेल ने द प्रोटोकॉल्स ऑफ द एल्डर्स ऑफ जायन, क्रिटिकली इल्यूमिनेटेड" (जर्मन में: Die Protokolle der Weisen von Zion, kritisch beleuchtet) नामक पुस्तक लिखी। अपनी पुस्तक के अंग्रेजी संस्करण की प्रस्तावना में, सेगेल ने लिखा:
"इस जालसाजी ने यहूदियों को असीम पीड़ा दी है और अब भी भ्रमित जनता के मन पर अविश्वसनीय प्रभाव डाला जा रहा है।"
एडॉल्फ हिटलर और प्रोटोकॉल्स
1920 के दशक की शुरुआत में, एडॉल्फ हिटलर को नाज़ी पार्टी के एक प्रमुख विचारक, अल्फ्रेड रोज़ेनबर्ग ने प्रोटोकॉल्स के बारे में बताया। पुस्तक में दिए गए षड्यंत्र की कहानियों ने हिटलर के इस विश्वास को और बढ़ा दिया कि प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी की हार के लिए यहूदी ही जिम्मेदार थे।
हिटलर ने 1920 के दशक में अपनी शुरुआती राजनीतिक भाषणों में प्रोटोकॉल्स का उल्लेख किया था। हिटलर ने अपनी आत्मकथा Mein Kampf (1925) में भी इस पुस्तक के बारे में लिखा था। हिटलर ने कहा कि प्रोटोकॉल्स "यहूदियों की सोच और कामों को दिखाते हैं और…उनके अंतिम मकसद का खुलासा करते हैं।" हिटलर ने यह भी भविष्यवाणी की थी कि जिसे वह "यहूदी खतरा" कहता था, वह तब खत्म हो जाएगा जब प्रोटोकॉल्स को अधिक व्यापक रूप से जाना जाएगा।
1933 में जर्मनी का चांसलर बनने के बाद, हिटलर ने सार्वजनिक भाषणों में प्रोटोकॉल्स का सीधा उल्लेख नहीं किया। लेकिन उसने अक्सर पुस्तक में बताई गई कई झूठी बातों को दोहराया। इन झूठे दावों में से एक यह था कि यहूदी साम्यवाद का फैलाव करने के लिए जिम्मेदार थे। इस यहूदी-विरोधी षड्यंत्र कहानियों को जुडियो-बोल्शेविज्म कहा जाता है।
नाज़ी प्रोपेगेंडा और प्रोटोकॉल्स
प्रोटोकॉल्स को 1933 में नाजियों के सत्ता में आने से एक दशक पहले ही झूठा साबित किया जा चुका था। इसके बावजूद, नाज़ी प्रोपोगेंडा ने कभी-कभी प्रोटोकॉल्स का उपयोग यह विचार फैलाने के लिए किया कि जर्मनी को यहूदी आक्रमणकारियों से अपनी रक्षा करनी चाहिए। हालांकि अधिकांश जर्मनों ने शायद प्रोटोकॉल्स नहीं पढ़े थे, लेकिन वे नाज़ी प्रोपोगेंडा अभियानों के माध्यम से इसके यहूदी-विरोधी झूठ से परिचित हो गए थे।
जोसेफ गोएबल्स, नाज़ी जर्मनी के जन जागरण और प्रोपेगेंडा मंत्री, समझ गए थे कि प्रोटोकॉल्स का इस्तेमाल यहूदियों को बदनाम करने के लिए किया जा सकता है। अपनी यह भूमिका संभालने से बहुत पहले, गोएबल्स ने अपनी डायरी में प्रोटोकॉल्स का उल्लेख किया था। उन्होंने लिखा था: "मुझे विश्वास है कि द प्रोटोकॉल्स ऑफ द एल्डर्स ऑफ जायन एक जालसाज पुस्तक है।” हालांकि, गोएबल्स ने आगे कहा, "मैं प्रोटोकॉल्स की आंतरिक सच्चाई में विश्वास करता हूँ, लेकिन इसकी तथ्यात्मक सच्चाई में नहीं।" गोएबल्स के लिए यह मायने रखता था कि प्रोटोकॉल्स नाजियों के यहूदी-विरोधी एजेंडा को आगे बढ़ाने में मदद कर सकते थे।
नाज़ी पार्टी के सबसे तीव्र यहूदी-विरोधी प्रोपोगेंडा में से कुछ ने प्रोटोकॉल्स का सहारा लिया। उदाहरण के लिए, जूलियस स्ट्राइचर, जो यहूदी-विरोधी अखबार Der Stürmer के प्रकाशक थे, उन्होंने 1930 के दशक में कई ऐसी कहानियां प्रकाशित कीं जो प्रोटोकॉल्स में शामिल विचारों पर आधारित थीं। नाज़ी पार्टी के केंद्रीय प्रकाशन गृह (फ्रांज एहर वेरलाग/ Franz Eher Verlag) ने 1919 से 1938 के बीच प्रोटोकॉल्स के 22 संस्करण प्रकाशित किए।
प्रोटोकॉल्स का झूठ के रूप में खुलासा किया गया: साल 1930 में
जर्मनी के बाहर नाज़ी समर्थकों ने भी प्रोटोकॉल्स की प्रतियों का प्रसार किया। उनके कार्यों को दो अदालती मामलों में चुनौती दी गई थी।
1934 में, दक्षिण अफ्रीका के ग्रैहमस्टाउन में, दक्षिण अफ्रीकी जेंटाइल नेशनल सोशलिस्ट मूवमेंट (जिसे ग्रेशर्ट्स भी कहा जाता है) के नेताओं के खिलाफ मुकदमा किया गया। इन नाज़ी समर्थकों पर प्रोटोकॉल्स जैसे दस्तावेज़ों का प्रसार करने के लिए मुकदमा किया गया और जुर्माना लगाया गया। दक्षिण अफ्रीका के सुप्रीम कोर्ट की एक डिवीजन ने फैसला दिया कि प्रोटोकॉल्स एक "मानहानिपूर्ण दस्तावेज़" है।
1935 में, स्विट्जरलैंड की एक अदालत ने नेशनल फ्रंट के प्रदर्शन के दौरान प्रोटोकॉल्स के जर्मन संस्करण का वितरण करने पर दो नाज़ी नेताओं पर जुर्माना लगाया। नेशनल फ्रंट बर्न, स्विट्जरलैंड में एक कट्टर राष्ट्रवादी और यहूदी-विरोधी संगठन था। मुकदमे की अध्यक्षता कर रहे न्यायाधीश ने प्रोटोकॉल्स को "मूर्खतापूर्ण बकवास" करार दिया।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान प्रोटोकॉल्स के नाज़ी संस्करण
द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) के दौरान, जर्मनी ने यूरोप के बड़े हिस्से, जिसमें सोवियत संघ के कुछ क्षेत्र भी शामिल थे, उनपर आक्रमण करके कब्जा कर लिया था। नाजियों द्वारा कब्जा किए गए देशों में प्रोटोकॉल्स का प्रसार किया। यहां तक कि लाखों यहूदियों को "अंतिम समाधान" के तहत मार दिए जाने के बाद भी, 1943 में जर्मन अधिकारियों ने प्रोटोकॉल्सके रूसी, यूक्रेनी और बेलारूसी संस्करण प्रकाशित किए। प्रोटोकॉल्स और अन्य यहूदी षड्यंत्र के झूठ को बढ़ावा देने वाले दस्तावेज़ जर्मनी द्वारा कब्जा किए गए फ्रांस, बेल्जियम और पोलैंड में भी प्रकाशित हुए।
प्रोटोकॉल्स का झूठ के रूप में खुलासा: होलोकास्ट के बाद
1964 में, एक अमेरिकी सीनेट उपसमिति ने एक रिपोर्ट जारी करते हुए प्रोटोकॉल्सको "एक क्रूर धोखा" करार दिया। यह रिपोर्ट शीत युद्ध के दौरान साम्यवाद को लेकर बढ़ती चिंता के समय लिखी गई थी। रिपोर्ट में बताया गया कि प्रोटोकॉल्स "धोखाधड़ी वाले उन दस्तावेजों में से एक हैं जो 'अंतरराष्ट्रीय यहूदी षड्यंत्र' के मिथक को फैलाते हैं।" सीनेट ने प्रोटोकॉल्स को "बकवास" करार दिया।
आज का यहूदी विरोधी विचारधारा, होलोकॉस्ट से इनकार, और प्रोटोकॉल्स
होलोकॉस्ट के बाद द प्रोटोकॉल्स ऑफ द एल्डर्स ऑफ जायन को झूठ साबित करने के बावजूद, इस पुस्तक की प्रभावशीलता कम नहीं हुई। प्रोटोकॉल्स और यहूदियों के खिलाफ षड्यंत्र रचने की सोच आज भी यहूदी विरोधी विचारधारा को बढ़ावा देते हैं। प्रोटोकॉल्स के दर्जनों भाषाओं में संस्करण प्रिंट और ऑनलाइन फॉर्मेट में उपलब्ध हैं। इस पुस्तक का उल्लेख अक्सर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया जाता है। अमेरिकी विदेश विभाग की 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रोटोकॉल्स का उसके मूल देश रूस में अभी भी महत्वपूर्ण प्रभाव है।
प्रोटोकॉल्स के कुछ नए संस्करण यहूदियों को COVID-19 महामारी के लिए दोषी ठहराते हैं। वे यहूदियों को युद्ध और आतंकवाद (जैसे 11 सितंबर 2001 को संयुक्त राज्य अमेरिका पर हमले) के लिए भी दोषी ठहराते हैं। दुनिया के कुछ क्षेत्रों में, प्रोटोकॉल्स को स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया गया है। यहां तक कि यह टेलीविजन कार्यक्रमों का आधार भी बन गया है।
प्रोटोकॉल्स का उपयोग राजनीतिक प्रोपोगेंडा और राष्ट्राध्यक्षों द्वारा भी किया गया है। उदाहरण के लिए, ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद (2005–2013) ने अपनी यहूदी-विरोधी बयानबाजी में प्रोटोकॉल्स के विषय का सहारा लिया है। अन्य प्रभावशाली राजनीतिक और सामाजिक नेताओं, विशेष रूप से मध्य पूर्व में, उन्होंने सार्वजनिक रूप से दावा किया है कि यह पुस्तक प्रामाणिक है। प्रोटोकॉल का उपयोग आतंकवादी संगठन हमास द्वारा यहूदी लोगों और इज़राइल राज्य दोनों के विनाश की मांग को सही ठहराने के लिए किया गया है।
प्रोटोकॉल्स के कुछ हालिया संस्करण होलोकॉस्ट की घटना को नकारते हैं (होलोकॉस्ट से इनकार)। अन्य संस्करण होलोकॉस्ट के इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ संस्करण झूठा दावा करते हैं कि यहूदियों ने इज़राइल राज्य की स्थापना के लिए नाजियों के साथ सहयोग किया।
प्रोटोकॉल्स के इन समकालीन संस्करणों का उद्देश्य अब भी वही है: यहूदी-विरोधी षड्यंत्र कहानियों को यहूदियों के खिलाफ झूठ फैलाना।।
फुटनोट
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Footnote reference1.
सदियों तक, कई ईसाई यह मानते रहे कि यहूदियों ने यीशु की हत्या करके देवहत्या (देवता की हत्या) की। वास्तव में, यीशु को रोमन अधिकारियों द्वारा मारा गया था। अलग-अलग ईसाई परंपराओं के नेताओं ने अपनी शिक्षाओं में इस गलत धारणा को बढ़ावा दिया। 20वीं सदी के अंत तक कुछ ईसाई चर्चों ने देवहत्या के आरोप को गलत बताते हुए उसकी निंदा की। उदाहरण के लिए, रोमन कैथोलिक चर्च ने 1965 में दूसरे वेटिकन काउंसिल के दौरान इन झूठों को खारिज कर दिया।
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Footnote reference2.
अप्रैल 1903 में तीन दिनों तक, गैर-यहूदी निवासियों ने अपने यहूदी पड़ोसियों के खिलाफ विद्रोह किया। उन्होंने सैकड़ों यहूदियों को घायल कर दिया और चालीस से अधिक यहूदियों की हत्या कर दी। किशिनेव नरसंहार (पोग्रोम) से पहले यहूदी-विरोधी प्रोपेगेंडा किया गया था, जिसमें रक्त कलंक का आरोप भी शामिल था। नरसंहार (पोग्रोम) अपराधियों ने अपने कार्यों को यहूदी आक्रमण के खिलाफ आत्मरक्षा का दावा करके उचित ठहराया।
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Footnote reference3.
फ्रीमेसन एक स्वेच्छिक भाईचारा संगठन है। इसकी जड़ें सैकड़ों साल पुरानी हैं, शायद 1300 के दशक की शुरुआत से है। 20वीं सदी के दौरान, यहूदी-विरोधियों और फ्रीमेसनरी के विरोधियों ने तर्क दिया कि यहूदियों ने फ्रीमेसन की विचारधारा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का दुरुपयोग अपने गलत इरादों के लिए किया। कुछ षड्यंत्र विचारकों ने यह दावा करते हुए यहूदियों और फ्रीमेसन को जोड़ना शुरू किया कि लॉज "जायन के बुजुर्गों" की सेवा में शामिल थे।
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Footnote reference4.
प्रोटोकॉल्स की तरह, जुडियो-बोल्शेविज्म भी एक षड्यंत्र कथा है। यह कहानी यहूदी षडयंत्रों से जुड़ी पुरानी यहूदी-विरोधी सोच पर आधारित है और यहूदियों के खिलाफ हिंसा भड़काने के लिए इस्तेमाल किया गया है।
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Footnote reference5.
बियारिट्ज़ नामक पुस्तक हरमन गेडशे ने लिखी थी, जो एक डाक कर्मचारी और प्रशिया की गुप्त पुलिस के लिए जासूस थे। उन्होंने यह पुस्तक "जॉन रेटक्लिफ़" के उपनाम से प्रकाशित की।